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Friday, October 4, 2013

107 - मुक्त-ग़ज़ल - सबके सपने.....................


सबके सपने सच कब होते ?
खाएँ मगर इनमें सब गोते ॥
जो बेवजह ही हँसते अक्सर ,
उनमें झरते ग़म के सोते ॥
रटते मत फँसना ,मत फँसना
जाल फँसे सब अहमक़ तोते ॥
उनके खेत न फलते केले ,
जो खेतों में बेर हैं बोते ॥
जिनको ग़म इफ़्रात में मिलते ,
ऐसे लोग बहुत कम रोते ॥
ख़ुद का बोझ ही कब उठता है ?
सब अपने अपने ग़म ढोते ॥
मैल ज़मीरों पर तारी है ,
लेकिन लोग बदन भर धोते ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 
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