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Sunday, September 1, 2013

104 : मुक्त-ग़ज़ल - कुछ ख़तावार कुछ.................


कुछ ख़तावार कुछ गुनाहगार होना था ॥
साफ़ होने को कुछ तो दाग़दार होना था ॥
जैसा मुमताज़ का है आगरे में ताजमहल ,
सरफ़रोशों का भी ऐसा मज़ार होना था ॥
उनको होना था सियासत में कामयाब अगर ,
खोल में गाय के लोमड़-सियार होना था ॥
चंद रुपयों में उनको कौन देता सब्ज़ी-फल ?
हाथ में पौंड या डॉलर का बार होना था ॥
तुम ही बतलाओ कैसे उनपे हम बरस पड़ते ?
कुछ तो उनके लिए दिल में गुबार होना था ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति
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