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Friday, August 9, 2013

99 : मुक्त-ग़ज़ल - आजकल बिस्तर पे............


आज कल बिस्तर पे हैं आराम ही आराम है ॥
इंतज़ारे मर्ग है और दूसरा क्या काम है ?
छोड़ दो पीना कहें सब छोड़ दो पीना मगर ,
ये न पूछें वो गटकता जाम पर क्यों जाम है ?
यूँ तो कितनी ही तमन्नाएँ हमारे दिल में हैं ,
जो हमारा हाल है बस एक का अंजाम है ॥
हमने तो दुनिया में कोई काम ऐसा न किया ,
फिर हमें ये मिल रहा किस बात का ईनाम है ?
गर करो इंसाफ़ तो फिर छोड़ दो इस बात को ,
आदमी वह कौन है ? कुछ ख़ास है या आम है ॥
रेग्जिस्तानों में यूँ पानी का रोना मत मचा ,
इस सफ़र में बूँद भी मटका बराबर जाम है ॥
तिश्नगी-ए-शराब क़तरे की भी एक सराब है ,
आदमी पी-पी के उल्टा होता तश्नाकाम है ॥
लोग डर डर के इबादत बंदगी करते वहाँ ,
क्या ख़ुदा गुंडा है दहशतगर्द उनका राम है ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति
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