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Wednesday, August 28, 2013

102 : मुक्त-ग़ज़ल - ऐसा नहीं कि...............


ऐसा नहीं कि हमको आता नहीं लगाना ॥
पर चूक-चूक जाए  है आज ही निशाना ॥
नादां अगर न होते तो बद को बद न कहते ,
अब किस तरह मनाएँ नाराज़ है ज़माना ?
जब तक न की थी हमने हाँ वो मना रहे थे ,
तैयार देख हमको करने लगे बहाना ॥
इतनी दफा हम उनसे सच जैसा झूठ बोले ,
अंजाम आज का सब सच उसने झूठ माना ॥
इक बार आज़माइश हमने न की है उनकी ,
जब जब भी उनको परखा पाया वही पुराना ॥
महफ़िल में अपनी-अपनी कहने में सब लगे हैं ,
सुनने न कोई खाली कहने से क्या फ़साना ?
इस फ़िक्र में कि अपना क्या होगा ज़िंदगी में ,
हम भूल ही चुके हैं क्या हँसना क्या हँसाना ?
कहता  है हिज्र में ही रहता है प्यार ज़िंदा ,
महबूब आख़िरश न शादी को मुझसे माना ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 
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