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Tuesday, April 23, 2013

87 : मुक्त-ग़ज़ल - या रब ये तूने.................


या रब ये तूने हमको किस रंग में रँग डाला ?
कौए भी चिढ़ाते हैं कह कह के काला काला ॥
जब कारसाज़ हमने तुझको कभी न पाया ,
क्या फ़ायदे की मस्जिद किस काम का शिवाला ?
हमको यूँ ही न समझो बेकार में शराबी ,
ग़म या ख़ुशी न हो तो छूते नहीं पियाला ॥
जलती है आग दोनों के पेट में बराबर ,
इस मुँह से छीनकर उस मुँह में न दो निवाला ॥
तमगों को रखके कोई देता नहीं उधारी ,
अबके तुम हमको देना इनआम नक़्द वाला ॥
दरवेश कब से दर पे दरवेश के खड़ा है ,
कासा बजाता गाता इक गीत दर्द वाला ॥
यूँ उसने हमें अपने दिल से किया है ख़ारिज ,
जैसे मवाद अपने फोड़े का है निकाला ॥
इनके तो मुआफ़िक़ है उनके भी मुताबिक़ है ,
इक हम हैं इश्क़ जिसको आए न रास साला ॥
चेहरा न ढाँपना तुम कुछ ढूँढ मैं रहा हूँ ,
इस बोगदे में चिनगी भर भी नहीं उजाला ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 
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