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Thursday, March 28, 2013

80 : मुक्त-ग़ज़ल - वहाँ के धुप्प..................



वहाँ के धुप्प अँधेरों में भी बिजली सा उजाला है
यहाँ सूरज चमकते हैं मगर हर सिम्त काला है

जो पाले हैं चनों ने वो हिरन ,खरगोश ,घोड़े हैं ,
ये कछुए , केंचुए हैं जिनको बादामों ने पाला है

यहाँ हर एक औरत सिर्फ औरत है जनाना है ,
वहाँ दादी है ,चाची है ;कोई अम्मा है, खाला है
॥ 

वहाँ स्कूल ,कालिज ,अस्पताल और धर्मशाले हैं ,
यहाँ पग पग पे मस्जिद,चर्च,गुरुद्वारा,शिवाला है

वहाँ हर हाल में हर काम होता वक्त पर पूरा ,
यहाँ सबनें सभी का काम कल परसों पे टाला है
 

- डॉ. हीरालाल प्रजापति
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