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Friday, March 8, 2013

63 : मुक्त-ग़ज़ल - आज बदल कर............


आज बदल कर मैं ख़ुद को रख डालूँगा ॥
जो जो कभी नहीं था मुझमें पालूँगा ॥
कल कल करते रहा मगर कल न आया ,
आज से कुछ भी कभी न कल पर टालूँगा ॥
दिन आए आराम किए बिन चलने के ,
राहों पे चलते चलते सुस्ता लूँगा ॥
कैसे गिरने दूँ उसको वो मेरा है ,
मैं ख़ुद फिसल फिसल कर उसे सम्हालूँगा ॥
उन आँखों के जाम मुहैया हैं जब तक ,
मैख़ाने की आँख में आँख न डालूँगा ॥
उसका अमृत पीने से तो मौत भली ,
तेरा जहर प्रसाद समझकर खा लूँगा ॥
गुस्से में आकर जिसको ठुकराया है ,
ग़र कर दें वो माफ़ तो फ़िर अपना लूँगा ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 
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