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Tuesday, March 5, 2013

60 : मुक्त-ग़ज़ल - घर में जो उसके............



घर में जो उसके दुश्मनों ने आग लगा दी ॥
तुमने हवाओं किसलिए रफ़्तार बढ़ा दी ।
उस हादसे के चश्मदीद के बयान पर ,
मुंसिफ़ ने बेगुनाह को भरपूर सज़ा दी ॥
आसाँ न हों ये कोर्ट कचहरी के मामले ,
थाने में रपट यूँ ही नहीं उसने लिखा दी ॥
खाने के भी पड़ जाएँगे लाले कहीं अगर ,
सारी रकम उधार की मयसूद चुका दी ॥
अपनों ने क़सम दे के मोहब्बत की दोस्तों ,
मुझ दुश्मने शराब को भी ख़ूब पिला दी ॥
इतने बड़े जहाँ में वो अमीर गिना दो ,
अपनी कमाई जिनने दूसरों पे लुटा दी ॥
महँगाई का सरकारी नौकरों पे क्या असर ,
मजदूर की सचमुच में इसने वाट लगा दी ॥
फ़िर उसको लगाने चले हैं पार दोस्तों ,
जिसने हमारी नाव कई बार डुबा दी ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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