Pages - Menu

Disclamer

All posts are covered under copyright law . Any one who wants to use the content should take permission the author before reproducing the post in full or part in blog medium or print medium by any other way.Indian Copyright Rules

Sunday, February 3, 2013

कविता : पेड़ का वध


भले ही वन-विभाग की /
विधिवत मंजूरी लेकर /
तात्कालिक अथवा दूरगामी /
सुनिश्चित लाभ के मद्देनजर ,
सुनियोजित अकाट्य तर्कों की छाया में /
सरेआम बेरहमी से _
आरों अथवा कुल्हाड़ों से /
कांक्रीट जंगल के नवनिर्माण में /
बाधा बन रहे /
एक वर्षों पुराने -
हरे-भरे बेशकीमती इमारती वृक्ष की ;
आकाश में उड़ती हुई चिड़िया के /
किसी शिकारी की गोली खाकर /
धरती पर फड़फड़ाते हुए गिरने के समान नहीं _
बल्कि _
किसी बच्चे द्वारा /
आकाश में फ़ेंके गए /
एक निर्जीव पत्थर के समान ,
मुझे उस मरते हुए जीवित पेड़ का
चुपचाप पटाक से गिर जाना _
रुलाता नहीं ,
बल्कि भर देता है उसके प्रति क्रोध से ,
जब
पकाकर खाये जाने के लिए /
एक अदना सी मुर्गी भी /
काटे जाते वक्त /
अपने को मारे जाने का /
फड़फड़ाकर _
पुरजोर विरोध करती है ,
अथवा चीखकर अपनी पीड़ा प्रकट करती है /
फलस्वरूप _
कभी कभार _
छूटकर भाग भी जाती है /
अथवा बिरले ही सही _
वधिक उसको दयार्द्र होकर बख़्श देता है ;
फिर इतना विशाल पेड़ क्यों नहीं चीत्कार करता /
बचाओ बचाओ चिल्लाता /
और कुछ नहीं तो काटने वालों पर ही गिर जाता ?
क्यों चुप रहता है ?
क्यों चुपचाप सहता है ?
क्या यही उसके पतन का एकमेव कारण है ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 
Post a Comment