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Tuesday, February 5, 2013

32. मुक्त-ग़ज़ल :मुझको बँगले न..........


मुझको बँगले न हवेली न किसी घर की तलाश ।।
सर छुपाने को फ़क़त फूस के छप्पर की तलाश ।।
जिसके हर घर में बगीचा हो एक हो आँगन ,
गाँव जैसा हो मुझे वैसे इक शहर की तलाश ।।
न मिठाई न मेवे फल न दवाई-दारू ,
पेट की भूख जो मारे है उस ज़हर की तलाश ।।
न तेंदुआ न चीताबाघ न कोई बिल्ली
मुझको गब्बर ओज़बर शेर-ए-बब्बर की तलाश ।।
न सुबह शाम का सूरज न सितारे ढूँढूँ ,
मुझको हर रात को चौदहवीं के क़मर की तलाश ।।
जिसने तकलीफ़ो ग़म न झेले न रोया हो कभी,
सारी दुनिया में मुझे ऐसे इक बशर की तलाश ।।
जिनको हममें ख़राबियाँ और ऐब दिखते हैं ,
हमको उनमें है इक अच्छाई इक हुनर की तलाश ।।
अब गुनाहों के खात्मे को मुझको लगता है,
इस ज़माने को है पुरताब पयम्बर की तलाश ।।
  क़मर=चाँदबशर=आदमीपयम्बर=अवतार ] 
-डॉ. हीरालाल प्रजापति      
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