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Tuesday, February 26, 2013

56 : मुक्त-ग़ज़ल - मुझको जीने की............


मुझको जीने की मत दुआ दो तुम ॥
हो सके दर्द की दवा दो तुम ॥
जुर्म क्यों मुझसे हुआ मत सोचो ,
जो मुकर्रर है वो सज़ा दो तुम ॥
मुझको अपना समझ रहे हो तो ,
अपने सर की हर इक बला दो तुम ॥
मैंने तुमको बहुत पुकार लिया ,
कम से कम अब तो इक सदा दो तुम ॥
यूँ न फूँको कि धुआँ ही निकले ,
ख़ाक कर दो या फिर बुझा दो तुम ॥
रखना क़ुर्बाँ वतन पे धन दौलत ,
गर ज़रूरत हो सर कटा दो तुम ॥
वो जो इंसान बनाते हैं यहाँ ,
उनको इंसानियत सिखा दो तुम ॥
फँस गया हूँ मैं जानते हो अगर ,
बच निकलने का रास्ता दो तुम ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 
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