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Thursday, February 21, 2013

51 : मुक्त-ग़ज़ल - छुड़ाकर हाथ से..................


छुड़ाकर 
हाथ से हथियार सब दुश्मन से लड़ने को ॥
अजब नासेह है पर काटकर कहता है उड़ने को ॥
ज़माने भर से बतियाता है बेहद प्यार से मुझसे ,
बिना के बिन लड़ा करता है बढ़ता है झगड़ने को ॥
फ़क़त उँगली थमाने से न उसका काम चलता है ,
वो हो जाता है फ़िर पहुँचा कभी गर्दन पकड़ने को ॥
नशे में धुत्त फ़िर भी होश की ही बात करता है ,
बुरा कहता है पीने और पीकर यूँ बहकने को ॥
बहुत मौक़ा हमें अपनी सुनाने का वो दे आकर ,
कि जब तक खोलते हैं लब वो हो जाता है चलने को ॥
जो मुझ पर दोस्ती के नाम पर जाँ तक लुटाता है ,
दुश्मने जाँ वो हो जाता  कहूँ ग़र इश्क़ करने को ॥
समझना मत उसे फैशन की फ़र्माइश बदन ढँकने ,
फटेहालों ने माँगीं हैं जो कुछ उतरन पहनने को ॥
ख़ुद अपने झाँककर देखें गिरेबाँ में जो औरों से ,
कहा करते हैं मौक़ा हो या बेमौक़ा सुधरने को ॥
(नासेह= उपदेशक ,बिना=आधार ,पहुंचा=कलाई )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति
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