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Tuesday, January 29, 2013

कविता : कसाई का बकरा बनना चाहता हूँ


झुण्ड में बकरियों के 
नौजवान इक बकरा 
गोपिकाओं में सचमुच 
कृष्ण सा दिखाई दे
जबकि भरे यौवन में 
तरसता अकेला हूँ 
किन्तु कसम बकरे की 
लोभ नहीं मैथुन का 
मेरी नज़र में तो बस 
उसका कसाई के घर 
काटने से पहले तक 
पुत्र सा पाला जाना है 
मरने से पहले उसको हर 
वो ख़ुशी मयस्सर है
जो कि गरीब इन्सां को 
ख्वाब में भी दुष्कर है 
दो जून की रोटी को 
दिन रात काम करता है 
फिर भी इतना मिलता है 
पेट नहीं भरता है 
और अगर मरता है 
खाली पेट मरता है 
बकरा बेफिक्र 
भरे पेट कटा करता है 
अपने गोश्त से कितने 
पेट भरा करता है 
हम तो न पाल पाते हैं
और न पले  जाते हैं 
क्यों वयस्क ( बालिग )होते हैं 
बेरोजगार दुनिया में 
सिर्फ़ पेट की चिंता में ही प्राण खोते हैं 
बकरे नहीं मरा करते 
वे तो कुर्बान होते हैं 
जो कुर्बान होते हैं 
वे महान होते हैं 
मुझको बकरा बनना है 
जन्म अगर हो अगला
 -डॉ. हीरालाल प्रजापति 
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