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Wednesday, January 9, 2013

2. मुक्त-ग़ज़ल : पूछ काम कितना..............


पूछ काम कितना और क्या न करना पड़ता है ॥
फिर भी रूखी - सूखी से पेट भरना पड़ता है ॥
फ़स्ल की कहीं कोई भी कमी नहीं लेकिन ,
अब भी कुछ गरीबों को घास चरना पड़ता है ॥
अपने हक़ की खातिर अब इस निजाम में अक्सर ,
बात बात पर अनशन धरना धरना पड़ता है ॥
कोई भी बुलंदी पे घर नहीं बना सकता ,
चाँद पर पहुँचकर सबको उतरना पड़ता है ॥
हद न पार करने की सीख के लिए शायद ,
रावणों को ऋषि बन सीताएँ हरना पड़ता है ॥
कृष्ण हो सुदामा हो गांधी हो या ओसामा ,
जो भी जन्म लेता है उसको मरना पड़ता है ॥
क्या करें खुशामद में अपने हब्शी आक़ा को ,
नौकरों को गोरा अंग्रेज़ कहना पड़ता है ॥
सिर्फ न हो मक़सद औरों को रिझाना ही ,
तहजीब के लिए भी सजना सँवरना पड़ता है ॥
दूसरे के खाने से भूख नहीं मिटती है ,
अपना पेट भरने को खुद को चखना पड़ता है ॥
है कई ख़ुदा का भी खौफ़ जो नहीं खाते ,
रस्मन अपने आक़ा से उनको डरना पड़ता है ॥
   -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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