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Tuesday, January 1, 2013

कहानी : प्रेरणा

       वह लड़की कभी भी मेरी मोहब्बत की तलबगार न थी क्योंकि न तो मैं खूबसूरत ही था और न ही कोई अमीरजादा।एक मामूली नौकरी करने उसके शहर में आया था। मेरे मकान मालिक की इकलौती व अत्यंत खूबसूरत लाड़ली बेटी थी वह।मैं चौबीस का था और वह उन्नीस बीस के लगभग।
      प्रारंभ से ही सहशिक्षा काल के दौरान मेरा अनेक लड़कियों से परिचय हुआ ,दोस्ती भी खूब हुई किन्तु मेरी बदसूरती और काली कलूटी रंगत ने मेरी मोहब्बत की लालसा को कभी पूरा न होने दिया। जिससे भी प्रेमाग्रह किया उसी ने आइना दिखाकर मेरी हँसी उड़कर रख दी और अंततः शनैः शनैः मोहब्बत और शादी के ख़याल दिल ही दिल में दम तोड़ने लगे।
     अपने प्रेम निवेदनो को जिस तिस के द्वारा ठुकराए जाने के बावजूद भी कभी भी मुझमें कुछ कर गुजरने की प्रेरणा जाग्रत नहीं हुई। मैं चाहता था कोई तो कहे ''कुछ करके दिखाओ'' पर कभी ऐसा न हुआ ...और जैसे तैसे एम. ए. करके यहाँ नौकरी पर आ गया।
पहली ही बार उस सुंदरी को देखकर मोहब्बत प्राप्ति के मरे हुए विश्वास पुनः जीवित हो उठे फ़िर भी पिछली घटनाओं ने मेरे प्रेम निवेदन की हिम्मत पस्त कर रखी थी इसलिए यूँ ही एक तरफ़ा मोहब्बत की आग में जलते हुए एक वर्ष बीत गया। कुछ दिनों की छुट्टियों में घर आकर मुझे लगा कि उसके बग़ैर ज़िन्दगी संभव नहीं। छुट्टियाँ पूरी किये बग़ैर  ही लौट आया।
वह कभी कभार ही मेरे कमरे पर आया करती थी किन्तु मैं छिप छिपाकर रोज़ ही उसके नज़ारे खिड़की दरवाजों कि दरारों से कर लिया करता था . उसके पिताजी के साथ उसके घर पर ही अक्सर शाम को शतरंज की दो एक बाजियां हो जाती थीं जिसमे मैं सदैव हार जाता था और वह मजाक उड़ाती थी। खैर।
एक दिन चाय पान के दौरान उसने मुझे ''अच्छा'' कहा। मै इस ग़लत फहमी का शिकार हो गया कि हो न हो वह भी मुझे पसंद करती है बल्कि प्यार भी करती है और उस दिन के बाद से उसके मान सम्मान को मैं उसकी मोहब्बत का इज़हार समझने लगा। एक दिन बहुत हिम्मत जुटाकर एक लव लेटर उसे लिख ही डाला। बड़े ही सहज भाव से ''क्या है''कहकर उसने पत्र  ले लिया . एक सप्ताह तक कोई लिखित जवाब नहीं मिला . कई खत लिखे और वह अजीब सी रहस्यमयी मुस्कराहट के साथ उन्हें हर बार स्वीकारती रही ...किन्तु जवाब न दिया। जब असहनीय हो गया तब एक आखिरी ख़त में आत्महत्या की धमकी देकर हाँ या न में तुरंत जवाब माँगा . दुर्भाग्य से वह ख़त उसकी माँ द्वारा पकड़ा गया।
जिस वक़्त मैं बेईज्ज़त करके उसके घर से निकाला जा रहा था तब भी वह रहस्यमयी ढंग से मुस्कुरा रही थी और उसकी आँखों में व्यंग्य जैसा भाव देख कर मैं शर्म से धरती में गड़ गड़ जा रहा था।
फिर मुझसे उस शहर में नौकरी न हो सकी . अपने गाँव आ गया। आत्महत्या न कर सका था इसलिए बेमन से किसानी करने लगा .
ज़िन्दगी से बेज़ार होकर मर मर कर ज़िल्लत का जीवन काट रहा था। घर वाले मेरी हालत पर तरसते भी थे और बिगड़ते भी.
रात की तन्हाई में  मोहब्बत  का दर्द आज इतना  बढ़ा ; अपमान  की  कसक इतनी तीव्र उठी  कि उस लड़की को अपनी मौत का ज़िम्मेदार ठहराते हुए एक सुसाइड-नोट लिखा और मौत का आसन तरीका सोचने लगा।
सुबह उठकर बाज़ार से सल्फास ले आया .अपनी ज़िन्दगी कि शाम के स्वागत में खूब स्फूर्ति तथा प्रसन्नता से अपने आपको दिनचर्या में ढालकर मौत को निगलने ही जा रहा था कि दरवाज़े पर पोस्टमैन कि दस्तक हुई .उस लड़की का मेरे नाम एक रजिस्टर्ड पत्र आया था . झट पट खोलकर किसी अनजान सुप्रतीक्षित आशा से पढने लगा।लिखा था ......
     ''मुझे यकीन है आप आत्म हत्या नहीं कर सकते . आपके बारम्बार दयनीय व सच्चे प्रेमाग्रह ने और उस दिन की अपमान जनक घटना ने आपके जाने के बाद मुझे आपके प्रेम को स्वीकार करने पर विवश कर दिया है ,किन्तु एक ही शर्त पर मैं आपसे शादी का वायदा करती हूँ कि तीन साल के अन्दर अन्दर आप आई ए एस अफसर बनकर मेरा हाथ मांगने आयें किन्तु इस बीच आपके और मेरे बीच न कोई पत्र व्यवहार होगा और न मेल मिलाप। आप शूद्र हैं और मैं उच्च वर्ण ...किन्तु अपनी ज़िद से माँ बाप को मना लूंगी। अवधि याद रहे ......अधिकतम तीन साल . अनवरत प्रतीक्षारत ......... सिर्फ़ और सिर्फ़ आपकी.......अनन्य प्रेमिका ..........
साथ में उसका एक अत्यंत सुन्दर फुल साइज़ रंगीन फोटो भी था।
इस पत्र से मेरी ज़िन्दगी का रंग ढंग बदल गया। टूटे क़दम पंख बन गए। सब कुछ भूलकर प्राण पण से लोक सेवा परीक्षा की तैयारी में अनवरत रूप से जुड़ गया। प्रेरणा रंग लाईI तीसरा साल जाते जाते मैं कलेक्टर के पद हेतु चयनित हो गया। बड़ी उमंगों सहित उसके घर उसका हाथ मांगने अपने पिताजी के साथ पहुंचा।
ड्राइंग रूम में ही उसकी तस्वीर पर चढ़ी चन्दन की फूल माला ने मुझ पर तीव्र वज्राघात किया.मैं निष्प्राण सा हो गया। उसके पिता ने सुबकते हुए बताया कि ...मेरे जाने के सप्ताह भर बाद ही एक दुर्घटना में उसके दोनों पैर जाते रहे व फूल सा सुन्दर चेहरा मांस उधड़ जाने की वजह से कुरूप हो गया । हालत सम्हलने पर उसने मुझे वह पत्र लिखा जिसे खुद उसके पिता ने रजिस्ट्री द्वारा मुझे प्रेषित किया। कुछ ही रोज़ बाद अपनी विकलांगता और बदसूरती के बोध से आत्म प्रताड़ित होकर एक साथ नींद की कई गोलियां लीलकर सदा सदा के लिए सो गई।
एक कभी न भरने वाली कमी , एक कभी न मिटने वाली असहनीय तड़प लेकर मैं अपनी लाश को किसी तरह ढो लाया।
अब भी यही सोचता हूँ कि यदि वह जिंदा होती तो क्या उस ''बदसूरत'' (  जिसकी खूबसूरत तस्वीर को मैं ढाई साल तक शिद्दत से चूमता रहा ) से मैं ( बद्सूरत ) मोहब्बत कर पाता यदि नहीं तो मुझे मोहब्बत के नाम पर ठेंगा दिखाने वाली सुंदरियों ने मेरे साथ कोई अन्याय नहीं  किया था न कि उस लड़की ने जिसको लव लेटर पकड़े जाने के बाद बेइज्ज़त होते वक़्त मैंने मन ही मन उसकी बर्बादी की असंख्य  बद्दुआएँ जाते जाते दे डाली थीं ...क्या वे ही तो उसे नहीं लग गईं ?इस अपराध बोध ने कि  '' मैं ही उसका कातिल हूँ '' प्रायश्चित्त स्वरुप आज तक मुझे विवाह नहीं करने दिया ..............और न आगे कभी करूँगा...................
-डॉ. हीरालाल प्रजापति
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