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Wednesday, January 30, 2013

22. मुक्त-ग़ज़ल : रहने दो सबको अपने........................


रहने दो सबको अपने अपने मुगालतों में ॥
जो ख्वाब में मज़ा है कहाँ है हकीकतों में ॥ 
न चाहकर भी अच्छा अच्छाई भूल जाये ,
ऐ नाजनीन ऐसे पेश आ न खल्वतों में ॥
अच्छाई पर भी तेरी अच्छा न कह सकेंगे ,
मिलता है इक मज़ा सा जिनको शिकायतों में ॥
उनका अजब है धंधा साँसे उखाड़ने का ,
फिर आ के खुद ही देना कांधा भी मय्यतों में ॥
पत्थर में देवता की सूरत तराश ली है ,
है फिक्र किसको हो न हो असर इबादतों में ॥
बदशक्लों का उड़ाना न मज़ाक हसीन लोगों ,
कितनों की जाँ गई है ऐसी शरारतों में ॥
आपस में ही सुलझ लो छोटा सा मामला है ,
इक उम्र होती लाजिम अपनी अदालतों में ॥
मिलता नहीं सुकूत अब शहरों के बीच काइम ,
स्कूल , अस्पतालों , मंदिर में मरघटों में ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 
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