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Saturday, January 26, 2013

18. मुक्त-ग़ज़ल : कुछ नहीं सूझता.......................


कुछ नहीं सूझता कि क्या लिक्खूँ ?
पहला ख़त है डरा डरा लिक्खूँ ॥ 
उसने पूछा है हाल-ए-दिल मेरा ,
कोई बतलाये क्या हुआ लिक्खूँ ?
हुस्न के  कितने  रंग होते हैं ?
उसमें बाकी है कौन सा लिक्खूँ ?
उसका हर पल ज़ुबाँ पे नाम रहे ,
क्या ग़लत हो उसे ख़ुदा लिक्खूँ ?
उसको पाने के इलावा मेरा ,
कोई मक़सद न अब रहा लिक्खूँ ?
मुझको लिखना है एक अफ़्साना ,
क्यूँ न अपना ही वाकया लिक्खूँ ?
उसपे मरता हूँ उसपे मरता हूँ ,
एक ही जुम्ला कई दफ़ा लिक्खूँ ?
वाकया=घटना ;जुम्ला=वाक्य )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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