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Monday, December 31, 2012

सन्डे हो या मंडे खाओ मुर्गा मछली अंडे

      पौर्वात्य  शिष्टाचार कहता है कि हमें किसी व्यक्ति के खाने पीने की बुराई नहीं करना चाहिएअतः सभ्य होने के नाते हमें चाहिए कि हम माँ भक्षियों के आगे मुर्गा मटन की अथवा सुरा प्रेमियों के सामने शराब की निंदा कदापि करें क्योंकि मुझे यकीन  है कि यदि खान पान को धर्म / जाति से जोड़कर देखा जाये तो मेरे तमाम पण्डे-जैनी(शाकाहारी) मित्र मुर्ग-मुसल्लम,कबाब-बिरयानी ,मछली-अंडे पर आदमखोर बाघ की तरह टूट पड़ेंगे I
   भरवां बैगन क्या है ?भरवाँ आलू क्या है ? भरवाँ भिन्डी-करेला-गिलकी ये सब क्या हैं ? सब प्रतिरूप हैं ;फोटोकापी हैं ,डुप्लीकेट हैं I बैगन मुर्गे की एक टांग है ,आलू अंडा है ,भिन्डी करेला मच्छी है I बड़े भाई मेरा तो पक्का अनुभव है इनसे खानपान विषयक शास्त्रार्थ में उलझकर आप नहीं जीत सकते क्योंकि  जिस प्रकार आपके पास मांस मदिरा सेवन करने के तर्क हैं उससे कहीं ज्यादा लाजवाब कर देने वाले (कु) तर्क इन सिंहों और भैरवों के पास खाने पीने के हैं I
और भइये मैं तो कहता हूँ कि इस बारे में इनके मुँह लगने का परिणाम अंततः ...आये थे हरिभजन को औटन लगे कपास ....अथवा गए थे रोजा  छुडाने पड़ गई गले नमाज की तरह उल्टा पड़ जाये और आप घास फूस सॉरी साग सब्जी की  जगह मांस मदिरा की सटीक सतर्क वैज्ञानिक प्रशंसाएं सुन सुनकर मांस मदिरा का भोग लगाने लगें I बल्कि मैं तो कहता हूँ साधू संतों पीर पैगम्बरों बाबा बैरागियों जैनियों ब्राह्मणों किसी को भी तो यह हक है और यह शोभा देता है कि वे मांस-मदिरा प्रेमियों की कोने में ले जाकर कान में अथवा सरेआम नाक भौंह सिकोड़ सिकोड़कर अथवा उबकाई ले लेकर गोश्त और शराब की जुगुप्सापूर्ण निंदा करते फिरें .निंदा तो वैसे भी घोषित निंदनीय कृत्य  है .और  दूसरे बन्दर क्या जाने अदरख का स्वाद ?
निंदा का भी एक सलीका होता है I ये क्या कि बिना देखे सुनसुनाकर अथवा पूर्वाग्रह ग्रस्त होकर बिना किसी अनुभव के मात्र भ्रमात्मक पुस्तकीय ज्ञान के आधार पर गालियाँ बके जा रहे हैं ( एक वैज्ञानिक आचार्य मनुष्य को सर्वाहारी और मांसाहार को स्वास्थ्य प्रद बताता है वहीँ दूसरा धर्माचार्य अथवा अन्य शोधार्थी उसे जहरीला मानता है , यह सब भ्रमात्मक है ,मात्र आंकड़ा आधारित है ) और जनाब ये वो निंदक हैं जो प्रशंसा भी घोर निंदाई लहजे में करते हैं तो कल्पनातीत होगा कि इनकी निंदा का स्वरुप क्या होगा ?लगता है जैसे मांसाहारी अथवा मदिरा प्रेमी इंसान नहीं दरिन्दे हैं और इनका बस चले तो उन्हें निपटा डालें  किन्तु यह व्यावहारिक नहीं होगा क्योंकि सारी दुनिया जानती है कि आधी दुनिया मांसाहारी है ,पीने पिलाने वाली है और सामाजिक जीवन सापेक्षिक होता है ,एक दूसरे के बिना नहीं जिया जा सकता I आप मांसाहारियों से नाता नहीं तोड़ सकते
पवित्रता और शुद्द्धता की बात करने वाले कई तथाकथित शाकाहारी  हग्गू में पड़े सिक्के को भी इस चाव से चुपचाप उठाकर धो पोंछकर जेब के हवाले करते हैं कि हलवा भी शर्मा जाये I हम पर सैकड़ों साल तक राज करने वाले मुगलों और अंग्रेजों के तो आधारभूत खाद्य हैं ये ! आहार के आधार पर क्या हम इनकी अवहेलना कर सकते है ?कांग्रेस कि तो ये दो टांगों के समान हैं I हमीं कहते हैं कि जैसा अन्न वैसा मन अर्थात सारे इस्लामिक देशीय और यूरोपीय लोग बुरे होते हैं तो ऐसा नहीं है .शुद्ध शाकाहारी लड़कियां भी सल्लू आमिर और किंग खान की भयंकर दीवानी हैं और प्योर वेजिटेरियन लड़के क्या पक्के पुजारी बुड्ढे तक एक दुश्मन विदेशी से शादी कर लेने के कारण खून का घूँट पी पी कर हाथ मल के रह जाने के बाद भी  हैदराबादी कुड़ी सानिया मिर्ज़ा की नथनिया के अब तक पागल बने फिरते हैं तो जनाब असल चीज है प्यार I  
जिससे हम प्यार करते हैं उसके खान पान पे गौर नहीं करते I अतः बुराई करना छोड़ कर प्यार करना सीखो सब अच्छा लगने लगेगा ,सब अच्छे लगने लगेंगे -मांसाहारी भी और शाकाहारी भी I आज मांस की भारी खपत के बाद भी ताज़ा हरी क्या बासी पीली सब्जियां भी अफोर्डेबल नहीं रहीं ;सभी लोग शाकाहारी हो जायेंगे तो अंत में हम खुद ही एक दूसरे को खा डालने की स्थिति में पहुंच जायेंगे I इसे मांसाहार की वकालत मत समझिएगा I अरे जनाब ये बेलेंसिंग है I जब  किसी युग में लड़के कम थे तो पितृ ऋण से मुक्ति के लिए पुत्र पैदा करना अनिवार्य था ....इन अदर वर्ड्स अनिवार्य किया गया , आज लड़कियां घट रही हैं आप देखना अगले पोथी पुरानों में (आई चेलेंज यू )ये लिखा जायेगा कि बेटी को जन्मने  के बाद ही माँ बाप को मोक्ष मिलेगा वरना अनंत काल तक दोनों भूत-चुड़ैल बन कर धरती पे मंडराते रहेंगे I
किसी देश में चूहे बढ़ गए  थे तो उसे राष्ट्रीय भोज बना दिया गया था भले ही पहले चूहे की दुम देखकर भी उलटी आती रही हो और फिर आप ही सोचिये अंडे खाए जाएँ तो हर जगह कुक्डूं कूँ कुकड़ू कूँ नहीं सुनाई देने लगेगी ? बकरे कुर्बान किये जाएँ तो हर सू बो- बो की भौंडी और अश्लील ध्वनि सुनाई देगी I काले - सुअर खाने वालों को तो सब्सिडी मिलनी चाहिए क्योंकि इतनी खपत के बाद भी स्साले मंदिर तक में घुस जाते हैं ,बल्कि मैं तो कहता हूँ कि किसी धर्मग्रन्थ में ऐसा विधान किया जाए जिसकी मुनादी कौन बनेगा करोडपति के अमिताभ बच्चन से अथवा डर्टी पिक्चर की विद्या बालन से करवाई जाए कि मक्खी और मच्छर खाने से घोड़े और हाथी बराबर पुन्य मिलता है तो आप देखना  दो दिनों में ही मक्खी- मच्छर डायनासौर की तरह गायब हो जायेंगे I हैजा मलेरिया का नामो निशान मिट जायेगा I       
शायद मैं जज्बाती हो गया किन्तु ये समझिये कि विषय से भटक गया I जनाब ये मांस खाने के तर्क थे I इतने काफी हैं वरना आप भी मेरी तरह मांसाहारी बोलने लगेंगे  I और फिर हर चीज़ में अच्छाई बुराई छिपी हैसुना है दूध ज्यादा पीने से पार्किन्सन हो जाता है .कोई कहता है अंडा शाकाहारी है ,सन्डे हो या मंडे रोज खाओ अंडे I किस किस की सुने ?हम तो भिया अपने मन की करते हैं I       चलिए दूसरे मुद्दे पर आते है कि शराब क्यों पीयी जाए ( पीने के तर्क तो वेल नोन हैं )? सबसे फेमस और पापुलर तर्क है - गम गलत करने के लिए पीते हैं  यानि जो नहीं पीते उनको कोई गम नहीं या फिर उनके गम काबिले बर्दश्त हैं ? ये सर पे लोहा ढो रहे हैं बाक़ी सब कपास,हंय  I
     आजकल पार्टी शार्टी में बैक वार्ड कहलाये जाने से बचने के लिए भी सिर्फ सिर्फ गंगा जल अथवा आबे ज़म ज़म पीने वाले भी जानी जानी वाकर वाकर (सुना है बेचारे जानी वाकर ने कभी दारू नहीं चखी थी किन्तु इसी बदनाम दारू के नशे की एक्टिंग ने उसे शोहरत दी थी )हो जाते हैं I कई कहते हैं खुद को मिटाने के लिए पीते हैं (शायद आत्म हत्या करने में असफल रहते हों )यानि गुनाह लज्जतदार I बहुत से खुद को बचने के लिए भी पीते हैं वो यूँ कि वो कहते हैं कि मैं इसके बिना नहीं जी सकता और तब हमारा धर्म कहता है कि जिंदगी बचाने के लिए हर उपाय जायज है और हम आपद धर्मानुसार पीने की इजाजत दे देते हैं I
     कुछ सच्चाई बयां करने के लिए पीते हैं हांलाकि वो सच लाख बार  टुन्न होने के बाद भी जुबां पर आने के लिए बेक़रार है ,बाक़ी है I बहुत कम लोग ही ये कहते हैं कि वे मजे लेने के लिए शराब पीते हैं जबकि वास्तविकता यही है (मैं भी मजे लेने के लिए पीता हूँ किन्तु कहता हमेशा यही हूँ कि जीने अथवा गम गलत करने अथवा लिहाज रखने के लिए पी या चख रहा हूँ ).सभ्य समाज को यह सुनना कतई  मंजूर नहीं कि शराब बे वजह पीयी जाए ,मजा लेने के लिए पीना खोखली वजह है ,अनैतिक है जैसे धर्मानुसार तीसरा पुरुषार्थ
        देखिये तर्क-कुतर्क  से सब सिद्ध किया जा सकता है किन्तु सत्य आज भी परिस्थितियों पर निर्भर है I किसी को खुशियों में सूरज भी आइसक्रीम का गोला लगता है तो किसी दुखिता को पूनम का चाँद भी आग बरसाता महसूस होता हैसबके अपने अपने सत्य हैं यही परम सत्य है
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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