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Saturday, October 21, 2017

मुक्त-ग़ज़ल : 242 - महुए की कच्ची सुरा हूँ ॥


गड़ता कम भुंकता बुरा हूँ ॥
पिन नहीं पैना छुरा हूँ ॥
एक सिर से पाँव दो तक ,
कोयले ही से पुरा हूँ ॥
हड्डियों सा हूँ कभी , कभी _
बिस्कुटों सा कुरकुरा हूँ ॥
काठ का पहिया हो गर तुम ,
मैं भी लोहे का धुरा हूँ ॥
सबके दाँतों को हूँ कंकड़ ,
तुझ चबाने मुरमुरा हूँ ॥
सबको गंगा-जल उन्हे ही ,
महुए की कच्ची सुरा हूँ ॥
अपनी मर्ज़ी से लुटा , कब
मैं चुराने से चुरा हूँ ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Monday, August 28, 2017

मुक्त-ग़ज़ल : 241 - मैं हूँ लोहे का चना



राख़ को आग बनाने की न कर कोशिश तू ॥
मर चुका हूँ मैं जगाने की न कर कोशिश तू ॥ 1 ॥
मुझको मालूम है कितना तू भरा है ग़म से ,
दर्द हँस – हँस के छिपाने की न कर कोशिश तू ॥ 2 ॥
मैं तलातुम में किनारों से तो बचकर आया ,
मुझको फिर पार लगाने की न कर कोशिश तू ॥ 3 ॥
ऊँची मीनार से दे दे तू यक़ीनन धक्का ,
अपनी आँखों से गिराने की न कर कोशिश तू ॥ 4 ॥
मैं हूँ लोहे का चना मुझको समझकर किशमिश ,
अपने दाँतों से चबाने की न कर कोशिश तू ॥ 5 ॥
दिल मेरा भाग गया कब का चुराकर कोई ,
मुझको बेकार रिझाने की न कर कोशिश तू ॥ 6 ॥
( तलातुम = बाढ़ )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, August 19, 2017

मुक्त-ग़ज़ल : 240 - आग से ठंडी......



हँसना मत , हैराँ न होना देखकर मेरा जतन ॥
कर रहा हूँ आग से ठंडी जो मैं अपनी जलन ॥
कैसे कर जाते हैं लोग इसकी बुराई या ख़ुदा ,
मुझको तो जैसा भी है लगता है जन्नत सा वतन ॥
दिल नहीं चाँदी हो , सोना गर नहीं हो रूह तो ,
है वो ख़ुशबूदार फूलों से निरा खाली चमन ॥
उनसे तुरपाई को माँगी थी मदद ले आये वो ,
तेग़ सूई की जगह धागे की जा मोटी रसन ॥
( हैराँ =चकित ,रूह =आत्मा ,निरा खाली =सर्वथा रिक्त ,तेग़ =तलवार ,जा =जगह ,रसन =रस्सी )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Tuesday, August 8, 2017

मुक्त-ग़ज़ल : 239 - मैं कभी सावन कभी फागुन रहा हूँ



मग्ज़ की कब सिर्फ़ दिल की सुन रहा हूँ ॥
अनगिनत ख़्वाब उनको लेकर बुन रहा हूँ ॥
हो गया हूँ आज मीठा पान उनका ,
जिनको कल तक प्याज औ लहसुन रहा हूँ ॥
पूस का जाड़ा कभी तो जेठ की लू ,
मैं कभी सावन कभी फागुन रहा हूँ ॥
मैं हमेशा ही नगाड़े की न ढम - ढम ,
घुंघरुओं की भी मधुर रुनझुन रहा हूँ ॥
जो मिला चुपचाप उसी को रख लिया कब ,
अपनी मर्ज़ी से मैं कुछ भी चुन रहा हूँ ?
जिसको पाने जान तक की की न पर्वा ,
आज उसे ही पाके सिर को धुन रहा हूँ ॥
जब से वो मेरी हिफ़ाज़त भूल बैठे ,
दाल – गेहूँ की तरह ही घुन रहा हूँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Thursday, July 27, 2017

*मुक्त-मुक्तक : 873 - कच्ची मिट्टी



गलता बारिश में कच्ची मिट्टी वाला ढेला हूँ ॥
नेस्तोनाबूद शह्र हूँ मैं उजड़ा मेला हूँ ॥
देख आँखों से अपनी आके मेरी हालत को ,
तेरे जाने के बाद किस क़दर अकेला हूँ ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति