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Friday, January 5, 2018

मुक्तक : 874 - औरों को गिराने गड्ढे में.........

         
  औरों को गिराने गड्ढे में ख़ुद डूब कुएँ में बैठे हैं ।।
  ग़ैरों को हराने में अपना सब हार जुएँ में बैठे हैं ।।
   उनको ना नजर आ जाएँ बस ये सोचकर उनके ही आगे ,
    कुछ दूर किसी गीली लकड़ी से उठते धुएँ में बैठे हैं ।।
   -डॉ. हीरालाल प्रजापति

Monday, January 1, 2018

शुभकामना नववर्ष की.........

बादलों से गिर धरा पर कड़कड़ाती बिजलियों को ।।
जल से बाहर फड़फड़ाती फड़फड़ाती मछलियों को ।।
 फूल पर मंडराते भँवरों स्वस्थ-सुंदर तितलियों को ।।
यदि करें स्वीकार तो शुभकामना नव वर्ष की ।।
तंग गलियां सूनी सड़कों घर-मकानों के लिए ।।
मंदिरों की आरती कोठों के गानों के लिए ।।
सब पुलिसवालों को , सेना के जवानों के लिए ।।
यदि करें स्वीकार तो शुभकामना नव वर्ष की ।।
पापियों का सर जो काटें उन छुरी-तलवारों को ।।
शत्रु के पग में चुभें उन कीलों को उन ख़ारों को ।।
वक्त पर जो काम आये उन बुरे-बेकारों को ।।
यदि करें स्वीकार तो शुभकामना नव वर्ष की ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, December 2, 2017

मुक्त-ग़ज़ल : 247 - परदेस में.........



देस से परदेस में आकर हुआ मैं ॥
सेर भर से एक तोला भर हुआ मैं ॥
रेलगाड़ी जब से पाँवों से है गुज़री ,
सच में उस दिन से ही यायावर हुआ मैं ॥
कब रहा काँटा मैं गुस्से में भी कल तक ,
प्यार में भी आजकल खंजर हुआ मैं ॥
हो गया था आदमी जानूँ न कैसे ,
फिर वही पहले सा इक बंदर हुआ मैं ॥
एक वो रहने लगे क्या दिल में मेरे ,
कमरे से होटल के यारों घर हुआ मैं ॥
देखकर बर्ताव दुनिया का गुलों सँग ,
मोम से इक सख़्ततर पत्थर हुआ मैं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, November 26, 2017

मुक्त-ग़ज़ल : 246 - क़ब्र खोदने को ......


हैराँ हूँ लँगड़े चीतों सी तेज़ चाल लेकर ॥
चलते हैं रोशनी में अंधे मशाल लेकर ॥
हुशयारों से न जाने करते हैं कैसे अहमक़ ,
आज़ादियों के चर्चे हाथों में जाल लेकर ॥
चलते नहीं उधर से तलवार , तीर कुछ भी ,
जाते हैं फिर भी वाँ सब हैराँ हूँ  ढाल लेकर !!
हरगिज़ कुआँ न खोदें प्यासों के वास्ते वो ,
बस क़ब्र खोदने को चलते कुदाल लेकर ॥
माथे नहीं हैं जिनके उनके लिए तिलक को ,
कुछ लोग थालियों में घूमें गुलाल लेकर ॥
कुछ माँगने चला हूँ तो लाज़मी यही है ,
जाऊँ मैं उनके आगे मँगतों सा हाल लेकर ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Tuesday, November 14, 2017

मुक्त-ग़ज़ल : 245 - धूप क्या होती है

                                         

एक पतला जानकार पापड़ तला वो ॥
बिन हथौड़ा तोड़ने मुझको चला वो ॥
धूप क्या होती है दुख की , क्यों वो जाने ?
सुख के साये में हमेशा ही पला वो ॥
फूँककर पीता है गर जो छाछ को भी ,
दूध का होगा यक़ीनन इक जला वो ॥
है नहीं मँगता मगर जब जब भी आया ,
दर से मेरे कुछ लिये बिन कब टला वो ॥
जो मुकर जाता है अपनी बात से फिर ,
आदमी तो है मगर इक दोग़ला वो ॥
आज के हालात ने ही उसको बदला ,
कल तलक इंसान था इक सच भला वो ॥
राधिका उसको मिली कैसे हूँ हैराँ ?
जबकि रत्ती भर नहीं है साँवला वो ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति