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Sunday, March 19, 2017

*मुक्त-मुक्तक : 870 - दाँतों को पीस



दाँतों को पीस , मुट्ठियों को कस ख़ुदा क़सम ॥
खा-खा के एक दो न बल्कि दस ख़ुदा क़सम ॥
इक दौर था पसीना मेरा ग़ुस्से में भी तुम ,
इत्रे गुलाब बोलते थे बस ख़ुदा क़सम ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Friday, March 17, 2017

*मुक्त-मुक्तक : 869 - लो सप्त रंग



लो सप्त रंग घोल–घोल साथ ले जाओ ॥
कलंकहीनों के सँग होली खेलकर आओ ॥
रँगे सियारों को रँगने में रँग न ख़र्च करो ,
न रँग बदलते हुए गिरगिटों से रँगवाओ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Thursday, March 16, 2017

*मुक्त-मुक्तक : 868 - किसी का मौन



किसी की चीख़ और ना फिर 
किसी का मौन रोकेगा ॥
न हिन्दू सिक्ख ईसाई 
न जैन औ जौन रोकेगा ॥
जब ऊग आएँगे मेरी पीठ 
पर दो पंख उड़ने को ,
मुझे छूने से फिर आकाश
 बोलो कौन रोकेगा ॥
( जौन = यवन या मुसलमान )
डॉ. हीरालाल प्रजापति


Wednesday, March 15, 2017

*मुक्त-मुक्तक : 867 - दर खुला पिंजरे का रख



मुझसे बंदर को कहे कूदूँ न मैं , उछलूँ न मैं !
दर खुला पिंजरे का रख बोले कभी निकलूँ न मैं !
बर्फ़ हूँ यह जानकर दुश्मन मेरा मुझको पकड़ ,
धूप में रखकर ये कहता है मुझे पिघलूँ न मैं !!
-डॉ. हीरालाल प्रजापति