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Saturday, April 28, 2018

मुक्त मुक्तक : 885 - सूखा तालाब


कैसा ये अजीबोग़रीब मेरा जहाँ है ?
मौसम में बारिशों के भी सूखा ही यहाँ है !!
सोना न चाँदी , हीरे न मोती समझना तुम 
तालाब में यूँ अपने ढूँढूँ पानी कहाँ है ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, April 22, 2018

मुक्त ग़ज़ल : 253 - दामाद




ग़मज़दा लोगों को क्यों मैं याद रहता हूँ ?
दर्द में भी जो ख़शी सा शाद रहता हूँ !!
अपने सीने में जकड़ लो बाँध लो कसके ,
ऐसी ही क़ैदों में मैं आज़ाद रहता हूँ !!
उसके क़ब्ज़े में मैं उसकी ज़िद की ख़ातिर सच ,
बाप होकर उसका बन औलाद रहता हूँ !!
शह्र की उजड़ी हुई हालत पे मत जाओ ,
अब भी मैं तब सा यहाँ आबाद रहता हूँ !!
जाने क्यों उसकी ख़ुदी के इक सुकूँ भर को ,
होके अव्वल भी मैं उसके बाद रहता हूँ !!
वक्त देखो जो मुझे दुत्कारते आए ,
बनके उनका ही मैं अब दामाद रहता हूँ !!
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Friday, March 30, 2018

मुक्त मुक्तक : 884 - प्रेम


पूर्णतः करते स्वयं को जब समर्पित !!
प्रेम तब बैरी से कर पाते हैं अर्जित !!
जान लोगे यदि गुलाबों से मिलोगे ,
पुष्प कुछ काँटों में क्यों रहते सुरक्षित ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Thursday, March 29, 2018

मुक्त ग़ज़ल : 252 - वो नहीं होगा मेरा.......


वो नहीं होगा मेरा ये जानता हूँ मैं !!
फिर भी उसको अपनी मंज़िल मानता हूँ मैं !!
दोस्त अब हरगिज़ नहीं वह रह गया मेरा ,
फिर भी उस से दुश्मनी कब ठानता हूँ मैं !!
पीठ में मेरी वो ख़ंजर भोंकता रहता ,
उसके सीने पर तमंचा तानता हूँ मैं !!
वह मुझे ऊपर ही ऊपर जान पाया है ,
उसको तो अंदर तलक पहचानता हूँ मैं !!
सूँघते ही जिसको वो बेहोश हो जाते ,
रात दिन उस बू को दिल से टानता हूँ मैं !!
वो मेरी लैला है 'लैला' 'लैला' चिल्लाता ,
ख़ाक सह्रा की न यों ही छानता हूँ मैं !!
( टानता = सूँघता , सह्रा = जंगल )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, March 24, 2018

मुक्त मुक्तक : 883 - इक पाँव


क्या शह्र फ़क़त , क़स्बा ही न बस , 
इक गाँव से भी चल सकते हैं !!
कोटर , बिल , माँद , दरार , क़फ़स से 
ठाँव से भी चल सकते हैं !!
होते हैं दो पंख भी बेमानी 
उड़ने का इरादा हो न अगर ,
मंज़िल की मगर धुन हो तो कटे 
इक पाँव से भी चल सकते हैं !!
-डॉ. हीरालाल प्रजापति